एक दिन एक विद्वान संत (wise saint) अपने शिष्यों के साथ बाहर भ्रमण कर रहे थे तो धीरे धीरे वो नदी के किनारे चले आये तो क्या देखते है कि एक मछुवारे वंहा पर जाल डालकर मछलिया (fishes)  पकड़ रहे है तो उन्होंने अपने शिष्यों को पास बुलाया और उनसे कहा चलो इधर आओ मैं जल्दी से तुम्हे कुछ जीवन (life) के सत्य के बारे में कुछ और बताना चाहता हूँ इस पर शिष्य उनके पास दौड़े दौड़े आये तो संत कहने लगे देखो अभी अभी इस भाई ने कुछ मछलियाँ (fishes) पकड़ी है और तुम अगर ध्यान से देखते हो तो पाओगे कि इनमे से कुछ मछलियाँ (fishes) ऐसी है जो जाल में कैद होने के बाद भी निश्चल पड़ी है और बाहर निकलने के लिए कोई प्रयत्न नहीं कर रही है जबकि इनमे से ही कुछ ऐसी भी है जो प्रयत्न तो कर रही है लेकिन फिर भी सफल नहीं हो पा रही है और अगर तुम और ध्यान से देखते हो तो पाओगे कि कुछ मछलियाँ (fishes) ऐसी भी है जो प्रयत्न करती है और फिर बाहर निकलने में सफल (succes) हो जाती है और फिर से पानी में भी चली जाती है और एक सबक लेकर कि उन्हें फिर इस तरह के लालच में नहीं फसना है |

ठीक इसी तरह मनुष्यों की भी कुछ श्रेणिया होती है कुछ मनुष्य ऐसे होते है जो जिन्दगी में किसी बाधा के आने पर  उन्हें स्वीकार कर लेते है और उनकी प्रगति वन्ही पर रुक जाती है जबकि कुछ होते है जो कोशिश तो करते है लेकिन फिर भी वो उस मुश्किल से बाहर नहीं निकल पाते है लेकिन हाँ पहले वाले लोगो के समूह से वो थोड़े बेहतर है जो कोशिश तो करते है लेकिन तीसरी वाली श्रेणी के लोग जो बहुत कोशिश करते है और अपनी हिम्मत नहीं खोते है वो लोग हिम्मत रखते है और कोशिश करते है और हार नहीं मानते है जिसकी वजह से बड़ी आसानी से वो इस मुश्किल से छूट जाते है |

कहा गया है  कि मूर्ख दोस्तों से अच्छा दुश्मन होता है क्योंकि हम कई बार अपने दोस्तों की वजह से मुश्किल में नहीं फंसते जबकि मूर्ख दोस्त की वजह से हम लोग खुद को मुसीबत में पाते है इसलिए अपने दोस्तों के चुनाव में बेहद सावधानी भरतें एक कहानी के जरिये हम इसे समझ सकते है जो बड़ी आसानी से आपको फर्क समझा सकती है |

एक समय की बात है एक बारहसिंगा बीमार हो गया | वह हरी भरी घास वाली भूमि पर जाकर सो गया | एक दो दिन में वो इतना कमजोर हो गया कि उसका हिलना डुलना भी बंद हो गया |  उसकी बीमारी के उपचार के बारे में खबर सारे जंगल में आग की तरह फ़ैल गयी |  उसके सारे मित्र उस से मिलने को आये और वो सारे घास चरने वाले पशु थे | बारहसिंगा के उपचार के लिए सभी लोग वंहा पर ठहर गये और वंहा के भूमि पर मौजूद हरी हरी घास को चरते रहे |

कुछ ही दिनों में घास का एक तिनका भी वंहा पर नहीं बचा | इधर कुछ ही दिनों के बाद बारहसिंगा भी स्वस्थ होने लगा लेकिन कमजोरी के कारन वो अभी भी चल फिरने में तो असमर्थ ही था | उसे ठीक होता देखकर उसके सभी मित्र जाने लगे | अब वो बारहसिंगा बड़ी मुश्किल में हो गया क्योंकि कमजोर होने के कारण वो अभी भी चरने के लिए कंही दूर जाने में असमर्थ था इसलिए अब वो भूख से बेहाल हो गया और जल्दी ही चल बसा |

यदि उसके मित्र उसके आस पास की घास नहीं चरते तो शायद वो नहीं मरता क्योंकि वो चलने फिरने में तो असमर्थ था तो वन्ही अपने आस पास की घास को खाकर वो निश्चित ही जीवित बच सकता था | परन्तु उसके मूर्ख मित्र तो उसके लिए दुश्मन से भी अधिक बढ़कर सिद्ध हुए |

यह कहानी जीवन की भागमभाग को दिखाती है जो दिखाती है कि जीवन की इस भागम भाग में भी अंत में वही सफल होती है तो जीवन की इस व्यस्तता में भी दूसरे लोगो के लिए अपना समय निकालता है |

एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे | गुरुकुल में राजा महाराजाओं से लेकर साधारण बच्चे भी शिक्षा के लिए आया करते थे | वर्षो से शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चो के एक बैच की शिक्षा आज  खत्म होने वाली थी | सभी बड़े उत्साह के साथ घर लौटने की तेयारी कर रहे थे तभी ऋषि की तेज आवाज सभी लोगो के कानो में पड़ी | ऋषि कह रहे थे सभी बच्चे मैदान में इक्कठे हो जाएँ |

सभी बच्चे मैदान में इक्कता हो गये और सब के आ जाने के बाद गुरु ने उनसे कहा चूँकि आप सभी का आज अंतिम दिन है इसलिए मैं चाहता हूँ आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें यह एक बाधा दौड़ होगी आप सभी को कई बाधायों से होकर गुजरना होगा जन्हा कंही पर आपको पानी में से गुजरना होगा कंही पर आपको कूदना भी होगा और अंत में एक अँधेरी सुरंग में से होकर गुजरना है |

दौड़ शुरू हुई | सब लोग बड़ी तेजी से दौड़ रहे थे लेकिन जब वो उस अँधेरी सुरंग के पास पहुंचे जिसमे से उन्हें गुजरना था और उस रास्ते में जाने से पहले बहुत सारे नुकीले पत्थर पड़े हुए थे इस पर अब तक जो एक जैसा बर्ताव कर रहे थे उन सबका बर्ताव बदल गया क्योंकि पत्थर बहुत नुकीले थे और उस पर पैर रखने पर बहुत पीड़ा हो रही थी खैर सभी ने जैसे तेसे दौड़ पूरी की और आश्रम पहुंचे |

इस पर ऋषि जो इनका इंतज़ार कर रहे थे कहने लगे मैं देख रहा हूँ तुम में से कुछ लोगो ने बड़ी जल्दी दौड़ को पूरा कर लिया और कुछ लोगो को बहुत समय भी लगा ऐसा क्यों इस पर एक शिष्य ने कहा गुरूजी जब हम सुरंग में घुसने वाले थे उस रस्ते पर शुरू में बहुत सारे पत्थर भी थे तो कुछ लोग तो जैसे तेसे उनकी परवाह किये बिना निकल गये लेकिन कुछ लोग उन पत्थरों को उठाकर अपनी जेब में डालने लगे ताकि वो  पीछे आने वाले लोगो के पैरो में नहीं चुभे इसलिए किसी को अधिक समय लगा और किसी को कम |

इस पर गुरु ने कहा जिन लोगो ने पत्थर इकठा किये वो लोग आगे आयें और मुझे दिखाएँ इस पर कुछ शिष्य जिन्होंने ऐसा किया था वो लोग आगे आये तो देखते है वो पत्थर नहीं जबकि हीरे थे जो अँधेरे में उन्हें पत्थर लग रहे थे इस तरह गुरु ने कहा जो दूसरों की परवाह करते हुए जिन्दगी में आगे बढ़ता है उसे ही सफलता मिलती है जिस तरह ये हीरे उन लोगो के लिए मेरी तरफ से उपहार है जिन्होंने दौड़ में जीतने की परवाह नहीं करते हुए दूसरों के पैरों में पत्थर नहीं चुभे इस बात का ख्याल किया |

सुंदरवन में ठण्ड ने दस्तक दे दी थी और सभी जानवर कठिन मौसम के लिए तेयारी में जुटे हुए थे | सुगरी चिड़िया भी उनमे से एक थी उसने एक शानदार घोंसला तेयार किया और उसे घास फूस से ढक दिया | अचानक ही मौसम बदल गया और बिजली कडकने लगी देखते ही देखते घनघोर वर्षा होने लगी |  भारी बरसात होने की वजह से ठण्ड बढ़ गयी और सभी जानवर अपने अपने घरों की तरह जाने लगे |

सुगरी भी ठण्ड के बढ़ जाने की वजह से अपने घर में वापिस आ गयी तो क्या देखती है कि एक बन्दर खुद को बचाने के लिए पेड़ के नीचे आ पहुँच गया |  सुगरी ने बन्दर को ठण्ड से कांपते हुए देखा तो उस से कहा तुम इतने होशियार बने फिरते हो तो ठण्ड से बचने के लिए अपना घर क्यों नहीं बनाया |  बन्दर को गुस्सा आया लेकिन फिर भी वह कुछ नहीं बोला इस पर चिड़िया उसे बोली अच्छा होता न तुम घर बना लेते तो तब तो गर्मी आलस में बिता दी और ठण्ड के कारण तुम्हारा बुरा हाल है |

इस पर बन्दर तैश में आ गया और चिड़िया से बोला कि अपने काम से काम रखो और मेरी चिंता नहीं करोगी तो ही बेहतर होगा | सुगरी शांत हो गयी थी लेकिन बन्दर अभी भी ठण्ड से कांप रहा था | पर सुगरी ने तो मानो उसे छेड़ने की कसम ही कहा रखी थी वह उसे भीगते हुए देख बोली कि अगर घर बनाया होता तो ये हालत …..| बन्दर बोला चुप एक दम चुप ज्यादा होशियार बनने की कोशिश मत करो | इस पर सुगरी फिर से चुप हो गयी |

बंदर अभी भी भीग रहा था थोड़ी देर बाद वो और जोर से काम्पने लगा तो चिड़िया से बोले बिना फिर से नहीं रहा गया तो उसने बंदर से कहा ‘कम से कम अब घर बनाना सीख लेना ‘ इस पर बंदर अब काबू से बाहर हो गया और पेड़ पर चढ़ गया और बोला ‘ मुझे तो घर बनाना नहीं आता लेकिन तोडना तो आता है यह कहकर उसने चिड़िया का घोंसला तहस नहस कर दिया | चिड़िया भी अब बंदर की तरह बेघर हो गयी थी | बेवजह नसीहत देने का नतीजा उसके सामने था |

जिन्दगी में हमे बहुत से अवसर ऐसे मिलते है जिन्दगी में हमे बहुत से अवसर ऐसे मिलते है है लेकिन फिर भी अपनी काबिलियत पर हमे गर्व हो तो चलता है लेकिन अभिमान जो कि दूसरे दर्जे का ओछापन है नहीं होना चाहिए क्योंकि यह चरित्र के विकास में रूकावट पैदा करता है और हम वो नहीं रहते जो होते है | इस कहानी के माध्यम से मैं आपको ये सपष्ट करना चाहूँगा |

समुद्र तट पर बसे हुए एक शहर में एक बहुत धनवान बनिया रहता था | उसके बेटों ने एक कौवे को पाल रखा था और वो लोग उसे जो भी जूठन बच जाती वो खिलते और उस से कौवा भी खुश और मस्त रहता था | एक बार कुछ हंस आकर वंहा उतरे तो उस सेठ के पुत्र उन हंसो के बारे में बहुत प्रशंसा कर रहे थे इस पर कौवे से हंसो की बडाई सुनी नहीं गयी और वो पहुँच गया हंसो के पास |

जाकर उनसे कहने लगा कि ‘भाई लोगो’ ऐसा तुम लोगो में क्या खास है जो लोग तुम्हारे बारे में इतना कह रहे है जबकि तुम मुझे उड़ान में हरा दो तो कुछ मैं जानू | इस पर एक हंस ने कहा नहीं भाई ऐसा कुछ नहीं है तुम ऐसी बात मत करो क्योंकि हम प्राकृतिक तरीके से ही लम्बी उड़ान भरने के लिए बने है इसलिए नाहक ही परेशान होने की आवश्यकता नहीं है और रही मुकाबले की बात तो उसकी जरुरत ही क्या है | इस पर कौवे ने कहा तुम लोग डरते हो क्योंकि मैं उड़ने की सौ गतियाँ जानता हूँ  इसलिए मेरे साथ उड़ने से डर रहे हो और इतने में कौवे के साथ के कुछ और पक्षी भी आगये जो कौवे की हाँ में हाँ मिलाने लगे इस पर हंसो ने कहा चलो ठीक है अगर तुम यही चाहते तो यही सही |

मुकाबला शुरू हो गया | समुद्र के उपर से सबने उड़ान भरी | समुद्र के ऊपर से कौवा कलाबजिया खाते हुए बहुत दूर तक निकल गया और हंस को पीछे छोड़ दिया लेकिन हंस अपनी सामान्य और धीमी गलती से उड़ता रहा | यह देखकर दूसरे कौवे बड़े खुश हुए लेकिन यह तो लम्बी उड़ान थी थोड़ी दूर आगे जाने के बाद कौवा थकने लगा और विश्राम के लिए द्वीपों की खोज करने लगा | लेकिन समुद्र के बीचो बीच कोई भी द्वीप उसे नजर नहीं आया अब तो कौवे को अपनी गलती का अहसास हो गया और वो थक कर चूर हो जाने के कारण समुद्र में गिरने की कगार में पहुँच गया उसकी गति धीमी हो जाने के कारन अब तो हंस भी कौवे के एकदम करीब आ गया था और हंस ने कौवे से कहा कि काक तुम्हारी पंख और चोंच बार बार पानी में क्यों डूब रहे है | हंस की व्यग्यपूर्ण बात सुनकर कौवे को बहुत पछतावा हुआ और उसने अपनी गलती स्वीकार करते हुए अपने प्राणों की रक्षा के लिए हंस से विनती की |  हंस ने इतना कुछ हो जाने के बाद भी उसे अपने पंजो से पकड़ा और जाकर उसके मूल स्थान पर जन्हा से वो चले थे छोड़ दिया |

ये कहानी हमे ये सीखती है कि कभी भी अपनी क्षमताओं का अभिमान नहीं करना चाहिए क्योंकि अवसर और स्थिति का सही मेल होने पर ही हम अपनी श्रेष्ठता साबित कर पाते है कोरे अहंकार से नहीं |

ये कहानी आपको कैसे लगी इस बारे में अपने विचार हमे कमेन्ट के माध्यम से दें |

गुरुकुल में शिष्यों की शिक्षा पूर्ण हो चुकी थी और आज उनका आखिरी दिन था | गुरुकुल की परम्परा के अनुसार गुरूजी अपने शिष्यों को आखिरी उपदेश देने की तेयारी कर रहे थे | जब सारे शिष्य गुरुकुल के मुख्य कक्ष में इक्कठे हो गये तो गुरूजी ने अपना उपदेश देना शुरू किया | उनके हाथ में लकड़ी के कुछ खिलोने थे | उन्होंने शिष्यों को वो खिलोने दिखाते हुए बोले “मेरे हाथ में जो ये खिलोने है आपको इन तीनो में से अंतर खोजना है ” गुरूजी की आज्ञा पाकर शिष्य बड़े ध्यान से खिलौनों को देखने लगे | वो तीनो लकड़ी के बने हुए खिलौने थे बिलकुल एक सामान दिखने वाले गुड्डे थे | जिनमे अंतर खोजना बहुत मुश्किल था  |

तभी एक शिष्य ने एक गुड्डे को परखते हुए कहा “अरे ये देखो इसके कान में छेद है |” यह संकेत काफी था इतने में सारे शिष्यों ने एक एक करके उन तीनो में अंतर खोज लिया |  तो उन सबने गुरूजी से बोला कि गुरूजी इस गुड्डो में बस यही एक अंतर है एक के कानों में छेद है | एक के मुहं में और एक कान में छेद है और एक के केवल एक कान में छेद है |

उनका जवाब सुनकर गुरूजी बोले बिलकुल सही कहा अब गुरूजी ने शिष्यों को धातू का एक पतला तार देते हुए उसे गुड्डो के कान में डालने को कहा | शिष्यों ने वैसा ही किया तो क्या देखते है एक गुड्डे के कान से होते हुए वो तार दूसरे कान से निकल गया | एक और गुड्डे के कान से होकर वो तार मुहं से निकल गया | जबकि एक के कान में तार डालने पर वो कंही से नहीं निकला |

इस पर गुरूजी ने उन्हें समझाया कि देखो इसी तरह तुम्हे जिन्दगी में तीन तरह के लोग मिलेंगे | एक वो जिनसे अगर तुम कुछ कहते हो तो वो एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते है ऐसे लोगो के साथ कोई भी बात तुम शेयर मत करना | एक वो लोग होंगे जो तुम्हारी बातें सुनकर किसी और के सामने जाकर कहेंगे ऐसे में उनसे कोई भी अहम् बात शेयर मत करना और एक वो होंगे जिनसे तुम कोई भी बात कहोगे जिन पर तुम भरोसा कर सकते हो उसी तीसरे गुड्डे की तरह और उनसे तुम किसी भी बात के विषय में सलाह ले सकते हो | ऐसे लोग तुम्हारी ताकत बनेंगे | बस आपको लोगो की सही परख होना आवश्यक है |

गर्भवती महिला डाक्टर के पास गयी | उसकी सास और पति बाहर बैठे हुए थे | अंदर केबिन ने डाक्टर के साथ एकांत पाकर वो अपनी मनोवेदना रोक नहीं पायी – ‘ डाक्टर साहब मेरे घरवाले मेरा भ्रूण परीक्षण करवाना चाहते है जबकि मेरी अंतरात्मा इसके लिए तेयार नहीं है तो आप मेरी मदद कीजिये आप कोई युक्ति बता दीजिये कि यह समस्या टल जाये | ‘

कुछ देर रुकने के बाद उसने डाक्टर से कहा – एक काम करिए मेरे पति और सास से कह दीजिये कि अगर आप भ्रूण चेक करवाते है तो मैं यह केस नहीं लूंगी और आप डिलीवरी भी कंही और करवा लीजिये |

डाक्टर कहने लगी – वैसे तुम क्यों नहीं चाहती ? क्या बेटा नहीं चाहिए तुम्हे ? एक बेटी तो है तुम्हे फिर क्यों तुम खतरा मोल ले रही हो ?

महिला – खतरा ! वह चौंक पड़ी |

डाक्टर साहब ! आज मैं ही अगर ऐसा सोच ले तो माँ कौन बनेगी और सृष्टि कैसे चलेगी ?

रचना गौड़ ‘भारती’

एक बार एक किसान (farmer ) ने अपने पडोसी को बहुत बुरा भला कह दिया | लेकिन बाद में उसे अपनी गलती का अहसास हुआ तो वो पश्चाताप के लिए एक संत के पास गया | उसने जाकर संत से अपने शब्द वापिस लेने का उपाय पूछा ताकि उसने मन का बोझ कुछ कम हो सके | संत ने किसान (farmer) से कहा एक कम काम करो तुम जाकर कंही से खूब सारे पंख इक्कठा कर लो और उसके बाद उन पंखो को को शहर के बीचो बीच जाकर बिखेर दो |
किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुँच गया | तो संत ने उस किसान से कहा क्या तुम ऐसा कर सकते हो कि जाकर उन पंखो को पुन: समेट के ले आ सको | इस पर किसान वापिस गया तो देखता है कि हवा के कारण सारे पंख उड़ गये है और कुछ जो बचे है वो समेटे नहीं जा सकते |
किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा तो संत ने उसे समझाया कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे शब्दों के साथ होता है तुम बड़ी आसानी से किसी को कुछ भी बिना सोचे समझे कह सकते हो लेकिन एक बार कह देने के बाद वो शब्द वापिस नहीं लिए जा सकते ठीक ऐसे ही जैसे ही एक बार बिखेर देने के बाद पंखो को वापिस नहीं समेटा जा सकता | तुम चाह कर भी उन शब्दों को वापिस नहीं ले सकते इसलिए आज के बाद कभी भी किसी से कुछ कहने से पहले विचार कर बोलना |

वर्षो पहले अनुपुर में धनीराम नाम का एक व्यापारी रहा करता था । उसके पास एक गधा था । वह उसे लल्लू के नाम से पुकारा करता था । धनीराम रोज के बोरी नमक की गधे पर लादकर शहर को ले जाया करता था । शहर जाने के लिए उसे नदी पार करनी होती थी । लम्बे समय से एक ही रास्ते से रोज आने जाने के कारण लल्लू रास्ता अच्छी तरह से पहचान गया था ।

धनीराम को जब विश्वाश हो गया तो वो गधे पर बोरी लाद देता और उसे शहर एक दुकानदार के पास अकेले ही भेज दिया करता था । शहर में एक व्यापारी उसकी बोरी उतार लेता तो लल्लू उसी रास्ते वापिस लौट आया करता था ।

एक दिन जब लल्लू पानी में उतर रहा था तो नमक की बोरी थोड़ी पानी में भीग गयी जिसके कारण थोडा नमक पानी में घुल गया जिस से बोरी का वजन कम हो गया और लल्लू को बहुत आराम मिला । इस तरह उसे पता चल गया कि बोरी के पानी में भीग जाने के कारण बोझ कम हो जाता है तो लल्लू हर रोज यही करने लगा ।

एक दिन शहर के व्यापारी को पानी से भीगी बोरी को देखकर थोडा शक हुआ तो उसने उसे तौल कर देखा तो नमक कम निकला इस पर उसने एक कागज पर सारी बात लिखकर बोरी में रख दिया ।

यह सुनकर धनीराम चौक गया और उस दिन उसने गधे की पीठ पर बोरी लादकर उसका पीछा किया तो जब उसने गधे को पानी में डुबकी लगाते हुए देखा तो वो भी उसकी सारी चालाकी समझ गया और इस पर उसने अगले दिन गधे की पीठ पर नमक की जगह कपास रखी और उसे रवाना कर दिया । गधे ने इस बार पहले की तरह जैसे ही पानी में डुबकी लगायी तो वजन कम होने की जगह और बढ़ गया । अब तो गधे से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था । जैसे तेसे वो पानी में से निकला और पहुंचा ।

फिर उसने आगे से कभी ऐसा नहीं किया और धनीराम ने इस तरह आलसी गधे को अच्छा सबक सिखा दिया ।

है कि बादशाह समेत सभी दरबारी उन पर हंस रहे है ।  उन्होंने ने बादशाह से पूछा कि ” बादशाह सलामत आप सभी हंस क्यों रहे है ?” इस पर बादशाह को मसखरी सूझी और वो बीरबल से कहने लगे बीरबल असल में हम सभी लोग रंगों के बारे में बात कर रहे थे जैसे कि सभी दरबारी गोर है मैं स्वयं भी गोरा हूँ जबकि हम सब में केवल तुम हो जो काले हो इसलिए जब तुम आये तो हम सभी लोगो की हंसी छूट गयी ।

बीरबल ने हमेशा ही तरह तपाक से जवाब दिया कि बादशाह सलामत आप मेरे रंग का राज नहीं जानते इसलिए ये बात कह रहे है ।बादशाह अकबर ने उत्सुकता से पूछा कैसा राज बीरबल ? तो बीरबल ने बादशाह को जवाब दिया कि हजूर माफ़ करें । जब भगवान ने संसार को बनाया तो वो पेड़ पौधे और पशु पक्षी बनाकर संतुष्ट नहीं हुए । फिर उन्होंने मानव बनाया । वे उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुए कि उन्होंने एक बहुत अच्छी कृति बनाई है तो उन्होंने सभी मनुष्यों को पांच मिनट का समय देते हुए उनसे कहा कि वो बुद्धि बल और धन में से कुछ भी ले सकते है । इस पर मैंने अपनी रूचि से सारा समय बुद्धि लेने में लगा दिया और बाकि चीजों को लेने का समय ही नहीं बचा था । आप सभी ने रूप और धन इक्कठा करने में अपना सारा समय लगा दिया । अब बाकि के लिए मैं क्या कहूँ आप खुद ही समझ लीजिये ।

बीरबल की बात सुनकर हस रहे दरबारी सन्न रह गये और उनके चेहरे से हसी गायब हो गयी सब नीचे देखने लगे  । इस पर बादशाह बीरबल की हाजिरजवाबी देखकर कर खिखिलाकर हंस पड़े ।